अंत:स्फ्रुणा
(शेष)

(शुरू से ...)

अंत:स्फ्रुणा  कोई निजी सिद्धी नहीं होती|
आप उसे बुद्धि से समझा या सिखा नहीं सकते और इसी लिए उसका उपयोग निजी स्वार्थ के लिए नहीं कर सकते | न ही उसको कोई चैलेन्ज का हिस्सा बनाना चाहिए| मैंने कोई खास पद्धति का प्रयोग कभी नहीं किया - में जो कुछ करता रहा हू इसे यहाँ इस उद्देश्य से बता रहा हू की शायद इस तरह से मेरे जैसे अन्य लोग जो दुसरोंको मदद कर रहे हो उन्हें कोई लाभ हो सके| मुझे जैसे जैसे अच्छे परिणाम मिलते गए मुझे अंत:-स्फ्रुणा  में ज्यादा विश्वास होता गया|
 
मेरे पास मार्गदर्शन के हेतु आने वाले व्यक्ति को में रिलेक्स होने को कहता हू | जब आदमी नितांत शांत होता है तब में उसे अपने आपको  खुला छोड़ने को समजाता हू - उन्हें कहता हू की जैसे आपकी कोई खोई हुई चीज को ढूंढने में  आपकी सहायता में कर रहा हू तो आप मुझे आपके सामन को टटोलने देंगे वैसे ही मुझे आपके भीतर आने दे| में अपनी भौतिक सीमाओं को नजर अंदाज करता रहता हू| 'मे और वह व्यक्ति' अलग नहीं लेकिन एक ही चेतना है ऐसी अनुभूति को दृढ करता हू | जाग्रत मन इस दौरान सिर्फ मुख्य मुद्दों को याद करने भर के लिए सजग रहता है | अपनी और से में इश्वर या परम शक्ति को प्रार्थना करता हू की 'यह व्यक्ति की समस्या के उपाय के हेतु अगर मुझे मार्गदर्शन के सेतु की भूमिका करनी है तो मुझे सहायता करे " फिर जो भी जवाब मुझे मिलते है उन्हें बिना तर्क के स्वीकार करता हू | विधि समाप्त होने पर इन मुद्दों के आधार पर उचित मार्गदर्शन देता हू | 
 
अंत:स्फ्रुणा के दौरान मेने महसूस किया है की एक ऐसी मनो-स्थिति आती है जब आप अपने भौतिक शारीर व् इसकी मर्यादओंको भूल जाते हो|
तभी संभव होता है की आपकी चेतना उच्चत्तर कम्पनोके आयाम में प्रवेश कर जाती है | यह वो आयाम है जो इन्द्रियों के क्रिया कलापों से परे होता है - यहाँ इन्द्रियों की सहायता के बिना ही आप चिजोको महसूस कर पाते हो|
 
में मानता हू की हर इंसान जन्म से ही अंत:स्फ्रुणा के क्षेत्र में प्रवेश करने को सक्षम होता है | मगर इन्द्रियों के माध्यम से ही चीजों को परख ने की आदत से उसकी यह क्षमता क्षीण होती जाती है या यु कहीये की यह क्षमता को वह भूल ही जाता है| यह ही सबसे बड़ी विडम्बना बन गई है की अब हम हमारी यह क्षमता के बारे में अबूध से हो गए है| मेरे और आपके बिच सिर्फ एक ही भेद है की में यह जानता हू व् विश्वास करता हू - और आप नहीं करते..!
 
इन्द्रियों के आधार पर ही चिजोको जानने की हमारी आदत ही सबसे बडी मर्यादा है जो हमें गुरु से लघु व् असीम से तुच्छ बना देती है | यही मर्यादा को उपनिषदों ने 'माया का पर्दा' कहा है |
यही अज्ञान से हम 'शिव मेसे जिव' बन जाते है |
 
अंत:स्फ्रुणा विधि के दौरान मैंने पाया की समय कोई श्रेणी नहीं है - समय तो किसी गोले मे भरे हुए प्रवाहि की तरह है जिसमे घटनाए तैरती रहती है | इसी कारण अंत:स्फ्रुणा में देखि घटना इंसान के भौतिक जीवन में घटित हो गई है या फिर भविष्यमे होने वाली है यह ठीक ठीक अनुमान लगाना मुश्किल होता है| यह भी देखा और महसूस किया गया की हम सब अलग नहीं पर एक ही चेतना के अंश है | हमारे स्वार्थ की सीमाओं को मिटाने से ही हम असीम बन जाते है |
  
मार्गदर्शन के हेतु आपके पास आए व्यक्ति को मदद करने में आप सुष्टि की उच्चतम प्रणाली (सिस्टम) के एक पुर्जे मात्र हो एसी मनोभावना को कायम रख कर अपने अहंकार को उठने नहीं देने की चौकसी रख पाना बहोत जरुरी है| सिस्टम को जितना मंजूर होगा इतना ही और जब मंजूर होगा तब ही आप की बात सच हो सकेगी यह बात हमेशा याद रखनी होगी |
 
अंत:स्फ्रुणा की इस क्षमता और ज्योतिष के ज्ञान के सम्मिश्रण से आप को सुन्दर अनुभव होंगे | थोड़े प्रयास के बाद जब आपको अपने निजी अनुभव हो जायेंगे, तभी आपको अपने आपकी क्षमता पर विश्वास हो जाएगा और आपको कोई और सबूत की जरुरत नहीं रहेगी | न आपको किसी के आगे इसे सिद्ध करने की ही जरुरत है न इसके लिए गर्वित होने की |
 
तो क्या यह अंत:स्फ्रुणा की क्षमता को कोई चाह कर के  अपने में विक्सित कर सकता है ? कुछ आवश्यक इंसानी गुणों का जिक्र तो हम ऊपर कर चुके है और कुछ और तरीके है जो मददगार हो सकते है | जिन्हें इस विषय में जिज्ञासा हो वे आगे पढ़े