अंत:स्फ्रुणा
 
१९८२ से मेंने ज्योतिष का अध्ययन शुरू किया| दिन में अक्सर ६ घंटे में ज्योतिष की किताबे या सामयिक पढ़ने या कुंडली के रहस्यों को समझने में व्यतीत करता आया हूँ|
 
ज्योतिष मेरे लिए शोख का विषय था ना की व्यवसाय| इसी लिए मेरे पास मार्ग-दर्शन के हेतु आने वाले मुख्यत: मेरे निजी सम्बन्धी, सहकर्मचारी व् पडोसी  होते थे| लोग आते, अपनी कुंडली ले कर और में वही कुंडली से उनका मार्गदर्शन करता था| कुंडली की बनावट सही सही हुई है या नहीं यह वेरीफाई करना उन दिनों संभव तो था पर सरल नहीं था| पुराने पंचांगो की उपलब्धि कठिन थी और पंचांग मिल भी जाए तो कुंडली को फीर से बनाने का मतलब था कम से कम २ घंटे उस पर खर्चना| ऐसे में कभी कभी ऐसे अनुभव हुए की एक ही जातक के बारे में पहले  दो या तिन बार कही हुई बात सच हुई थी पर अब वही कुंडली के आधार पर किया हुआ फल-कथन सच नहीं हो रहा था|
 
जब कम्पूटर पर चुटकी में कुंडली बनाना संभव हो गया तब ऐसे संशयात्मक किस्सोमें कुंडली फिर से बना कर देखना मुमकिन हो गया | और मालुम हुआ की जातक जो कुंडली ले कर आज तक आता रहा था वह कुंडली ही सच्ची नहीं बनी थी| तब प्रश्न यह खडा हुआ की कुंडली अगर पहले से ही गलत बनी थी तो फीर आज तक वही कुंडली से की हुई बातें कैसे सही हो रही थी?
 
दूसरी और कभी कभी ऐसी घटनाए सामने आती रही जिससे मुझे अंत: चेताना (इन्ट्यूशन) )से आती हुई बातों पर विश्वास करने की प्रेरणा हुई|
 
कई बार ऐसा हुआ की किसी व्यक्ति की कुंडली देखते देखते कुछ एसी बाते मनसे उठी  जिसे में उस व्यक्ति को कहने की हिम्मत नहीं कर सका | क्यो की वो अंदर से आती हुई बात, व्यक्ति को में जिस तरह से जानता था उससे बहुत भिन्न थी| इतना ही नहीं मुझे वह बातों के लिए कुंडली में से वैसे ग्रह योग भी नहीं मिले जिसके आधार पर मन में से उठी बातों को सच माना जा सके| ऐसे में अंदर से आई बातों को जाहिर नहीं करना ही समझदारी मानी गई|
 
समय बितने पर जब एसी घटनाए सच हो कर उजागर होने लगी तब मुझे एहसास होने लगा की ज्योतिष के बारिक से बारिक अभ्यास कर के निकाली गई संभावनाओ से भी ज्यादा सटीक हो सकती है मन के अंदर से आने वाली बातें| 
 
मैंने पाया की जब पूछने वाला पूरी निष्ठा से पेश हुआ हो और उसको मददगार होने की ज्योतिषी की भावना भी सहृदयी हो तब अंत:करण से निकली बातें आश्चर्यजनक ढंग से सच होती है|