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काल-सर्प दोष की मायाजाल

  

 
आज कल इंटरनेट, टीवी, ‍‌‍दैनिकपत्रों व् सामयिकों में काल-सर्प दोष के बारे में लेखों और विज्ञापनों की भरमार देखने मिल रही है| इस योग का नाम सुनने मात्र से दुखी व् हताश व्यक्ति और भी परेशान हो जाता है| एक और तो हमारे ज्योतिषी भाई ज्योतिष के पुराने ग्रंथों की तारीफ़ करते नहीं थकते और दूसरी तरफ काल-सर्प’ जेसे दोष के बारे में जब कहा जाता है की ऐसे कोई योग का ज्योतिष शास्त्रों में कहीं उल्लेख नहीं है तब उन्हें मानो सांप ने सूंघ लिया हो, सुना अन सुना कर देते है| उन्होंने काल-सर्प योग के कई और प्रकार भी आविष्कृत कर लिए है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस चुंगल में फांसा जा सके | स्वाभाविक है की जितने भिन्न प्रकार इतने ही उसके उपाय होने है| ज्यादा उपाय ज्यादा आय |

मेरी इस वेब-साईट में मैंने ज्योतिष के विभिन्न आयामों पर चर्चा की है मगर जब में उस साईट की एनालिटिक्स देखता हूँ तो हेरान होता हूँ; सबसे ज्यादा लोगो ने ‘काल-सर्प’ वाले पृष्ट को ही खंगाला होता है| हकीकत तो यह है की मैंने इस साईट के उस पृष्ट में यह दोष के भय को निरर्थक साबित किया है..!

जब कुन्डली में राहू और केतु के बिच शेष सारे ग्रह होते है तब इस योग को ‘काल-सर्प दोष’ मान कर अनेक बाधाओं का जनक बताया जाता है| वास्तव में राहू व् केतु कोई भौतिक पिंड तो है ही नहीं| पृथ्वी के आस-पास चंद्र की भ्रमण कक्षा पृथ्वी की भ्रमण कक्षा को जिस बिंदु पर काटती है उस बिंदु को राहू माना जाता है |

हिंदू माय्थोलोजी में राहू को दैत्य व् सर्प के सर के रूप में और केतु को सर्प की पूंछ माना जाता है| जब सारे ग्रह राहू-केतु के बिच होते है तो माना जाता है की राहू ने सारे ग्रहों को निगल लिया| ग्रह राहू के पेट में चले जाने की वजह से निर्बल हो जाते है और उन ग्रहों से अगर कोई राजयोग भी हो रहा हो तो भी उसका कोई लाभ ऐसी व्यक्ति को नहीं मिलेगा..!

लेकिन हम जानते है की बाकी ग्रहों से विपरीत – राहू और केतु की चाल उलटी होती है | मतलब की बाकी ग्रह कुंडली में एंटी-क्लाक घुमते है जबकि राहू -केतु कुंडली में क्लाक-वाइस चलते हैं | इसका मतलब हुआ की कुंडली में पहले स्थान से देखना शुरू किया जाए तो और कोई ग्रह से पहले राहू दिखाई देना चाहिए | ऐसा इस लिए होना होगा क्योंकि जब पहले मुंह हो और बादमे पूंछ हो तभी तो बिच में सर्प का शरीर होगा..! लेकिन अगर प्रथम भाव से शुरू कर के आगे बढ़ने पर अगर कोई ग्रह राहू से पहले विद्यमान है तो ‘सारे ग्रहों को राहू-केतु के बिच होने’ वाली शर्त पूर्ण नहीं होती |

काल-सर्प दोष की भयानकता से लोगों को डराने वाले ज्योतिषी इस उलटी चाल को नजर अन्दाझ कर लेते है – अन्यथा आधे लोग तो इसी वजह से इस तथा-कथित दोष से मुक्त हो जायेंगे| उल्टा चोर कोतवाल को डांटे – उन लोगों ने तो राहू व केतु से बाहर रह जाने वाले व राहू व केतु के बिच आजानेवाले ग्रहों को जोड़ कर के ‘अपूर्ण, सम्पूर्ण, अर्ध काल-सर्प’ जैसे और भी विविधरूप के ‘काल-सर्प’ दोष बना लिए|